बिहार की सांस्कृतिक पहचान की बात हो और मैथिली का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं। सदियों पुरानी साहित्यिक परंपरा, लोकगीतों की मिठास, मिथिला पेंटिंग की रंगीन दुनिया और विद्यापति की अमर रचनाओं से सजी मैथिली भाषा अब शिक्षा के राष्ट्रीय मंच पर नई पहचान पाने जा रही है।
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत मैथिली को अपने पाठ्यक्रम में मातृभाषा विषय के रूप में शामिल करने का फैसला लिया है। अब कक्षा 1 से माध्यमिक स्तर तक के विद्यार्थी मैथिली भाषा की पढ़ाई कर सकेंगे। यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि करोड़ों मैथिली भाषियों की सांस्कृतिक अस्मिता और वर्षों पुरानी मांग की बड़ी जीत मानी जा रही है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस फैसले को “ऐतिहासिक” बताते हुए कहा कि यह कदम आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों, संस्कृति और मातृभाषा से जोड़ने का सशक्त माध्यम बनेगा। मिथिलांचल में इस खबर के बाद उत्साह का माहौल है। Social media से लेकर शिक्षा जगत तक, हर जगह इस फैसले को लेकर चर्चा हो रही है।
लेकिन सवाल केवल इतना नहीं है कि मैथिली अब CBSE में पढ़ाई जाएगी। असली सवाल यह है कि क्या मातृभाषा में शिक्षा सचमुच बच्चों की सीखने की क्षमता बढ़ा सकती है? क्या इससे क्षेत्रीय भाषाओं को नया जीवन मिलेगा? और क्या यह फैसला भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक बड़े बदलाव का संकेत है?
मैथिली को CBSE में जगह मिलना क्यों है इतना बड़ा फैसला?
मैथिली केवल एक भाषा नहीं, बल्कि एक समृद्ध सांस्कृतिक संसार है। यह भाषा बिहार और नेपाल के कई हिस्सों में करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाती है। 2003 में मैथिली को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, जिसके बाद इसे आधिकारिक मान्यता मिली।
लेकिन लंबे समय तक यह शिकायत बनी रही कि भाषा को संवैधानिक मान्यता तो मिली, पर शिक्षा व्यवस्था में उसका पर्याप्त उपयोग नहीं हुआ। स्कूलों में अंग्रेज़ी और हिंदी का दबदबा बढ़ता गया, जबकि नई पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी मातृभाषा से दूर होती चली गई।
अब CBSE के पाठ्यक्रम में मैथिली को शामिल किया जाना इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे पहली बार राष्ट्रीय स्तर की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में मैथिली को व्यवस्थित स्थान मिलेगा। इससे न केवल भाषा का संरक्षण होगा, बल्कि बच्चों को अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ने का अवसर भी मिलेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब कोई बच्चा अपनी मातृभाषा में शुरुआती शिक्षा प्राप्त करता है, तो उसकी समझ और सीखने की क्षमता अधिक मजबूत होती है। यही विचार National Education Policy 2020 का भी आधार है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और मातृभाषा पर जोर
नई शिक्षा नीति 2020 ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में मातृभाषा की भूमिका को लेकर बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया था। नीति में कहा गया कि बच्चों को कम से कम कक्षा 5 तक और संभव हो तो कक्षा 8 तक मातृभाषा या स्थानीय भाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए।
सरकार का मानना है कि छोटे बच्चे अपनी मातृभाषा में अधिक सहज महसूस करते हैं। यदि प्रारंभिक शिक्षा उसी भाषा में दी जाए जिसे बच्चा घर में सुनता और बोलता है, तो learning outcomes बेहतर हो सकते हैं।
NCERT ने इसी दिशा में 121 भारतीय भाषाओं में primers तैयार किए हैं। इसके अलावा NCERT की किताबों का मैथिली सहित 22 अनुसूचित भाषाओं में अनुवाद भी किया जा रहा है। यह दिखाता है कि भारत अब धीरे-धीरे multilingual education model की ओर बढ़ रहा है।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसे विविध भाषाई देश में केवल एक या दो भाषाओं के आधार पर शिक्षा प्रणाली बनाना व्यावहारिक नहीं है। मातृभाषा आधारित शिक्षा बच्चों को मानसिक रूप से अधिक आत्मविश्वासी बनाती है।
कैसे शुरू हुई मैथिली को CBSE में शामिल करने की मांग?
मैथिली को CBSE पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग कोई अचानक उठी हुई मांग नहीं थी। वर्षों से मिथिलांचल के बुद्धिजीवी, साहित्यकार और सामाजिक संगठन यह मांग कर रहे थे कि भाषा को स्कूल शिक्षा में सम्मानजनक स्थान मिले।
इस मुद्दे को राजनीतिक स्तर पर भी लगातार उठाया जाता रहा। दरभंगा से बीजेपी सांसद गोपाल जी ठाकुर ने फरवरी 2026 में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी से मुलाकात कर यह मांग रखी थी।
इसके बाद शिक्षा मंत्रालय और NCERT ने इस पर विचार किया। अंततः CBSE ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 से मैथिली को माध्यमिक स्तर के पाठ्यक्रम में शामिल करने का निर्णय लिया।
यह निर्णय केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लंबे सामाजिक और सांस्कृतिक संघर्ष का परिणाम माना जा रहा है।
सम्राट चौधरी ने क्यों बताया इसे ऐतिहासिक कदम?
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह मिथिला की सांस्कृतिक विरासत और भाषाई अस्मिता के लिए गर्व का विषय है।
उन्होंने लिखा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय भाषाओं, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण को लगातार नई मजबूती मिल रही है। उनके अनुसार यह फैसला आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बनेगा।
राजनीतिक रूप से भी यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि बिहार की राजनीति में मिथिलांचल क्षेत्र की अपनी अलग पहचान और प्रभाव रहा है। मैथिली भाषा को शिक्षा में स्थान मिलने से क्षेत्रीय भावनाओं को भी मजबूती मिल सकती है।
क्या मातृभाषा में पढ़ाई सचमुच बेहतर होती है?
यह बहस केवल बिहार तक सीमित नहीं है। दुनिया भर में education experts इस बात पर सहमत हैं कि शुरुआती शिक्षा मातृभाषा में होने से बच्चे concepts को अधिक आसानी से समझते हैं।
जब बच्चा unfamiliar language में पढ़ाई करता है, तो उसका बड़ा हिस्सा भाषा समझने में चला जाता है। लेकिन मातृभाषा में पढ़ाई होने पर बच्चा सीधे विषय पर ध्यान दे पाता है।
UNESCO सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी mother tongue education को effective learning का महत्वपूर्ण आधार बताया है। भारत में tribal और regional language education पर भी अब ज्यादा जोर दिया जा रहा है।
हालांकि कुछ लोग यह सवाल भी उठाते हैं कि global competition के दौर में क्या regional languages पर ज्यादा जोर देने से English proficiency प्रभावित हो सकती है। Experts का कहना है कि multilingual model ही इसका समाधान हो सकता है, जहां मातृभाषा और global languages दोनों को संतुलित रूप से पढ़ाया जाए।
नई पीढ़ी और भाषाई पहचान का संकट
आज के समय में कई परिवारों में बच्चे अपनी मातृभाषा बोलने से भी हिचकिचाने लगे हैं। Urbanisation, English-medium education और digital culture ने regional languages के उपयोग को प्रभावित किया है।
मिथिलांचल के कई parents अब बच्चों से हिंदी या अंग्रेज़ी में बात करना ज्यादा “modern” मानते हैं। इसका असर यह हुआ कि नई पीढ़ी का अपनी भाषाई जड़ों से जुड़ाव कमजोर होने लगा।
ऐसे समय में CBSE में मैथिली को शामिल किया जाना केवल शिक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि cultural revival की दिशा में भी बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे बच्चों को यह एहसास होगा कि उनकी मातृभाषा भी उतनी ही सम्मानित है जितनी दूसरी भाषाएं।
मैथिली साहित्य और संस्कृति को मिलेगा नया जीवन?
मैथिली साहित्य की परंपरा बेहद समृद्ध रही है। विद्यापति की कविताएं, लोकगीत, नाटक और लोककथाएं इस भाषा की सांस्कृतिक गहराई को दर्शाती हैं।
लेकिन आधुनिक शिक्षा और career-oriented mindset के कारण regional literature से युवाओं की दूरी बढ़ती गई। यदि स्कूल स्तर पर मैथिली पढ़ाई जाएगी, तो नई पीढ़ी को अपने साहित्य और संस्कृति को समझने का अवसर मिलेगा।
Experts मानते हैं कि इससे:
- मैथिली साहित्य का नया पाठक वर्ग तैयार होगा,
- शोध और अकादमिक कार्य बढ़ेंगे,
- और क्षेत्रीय सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को नई पहचान मिलेगी।
क्या सिर्फ पाठ्यक्रम में शामिल कर देना काफी होगा?
यहीं सबसे बड़ी चुनौती भी है। किसी भाषा को पाठ्यक्रम में शामिल करना पहला कदम है, लेकिन सफल implementation कहीं अधिक कठिन प्रक्रिया होती है।
इसके लिए:
- प्रशिक्षित शिक्षकों की जरूरत होगी,
- गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकें तैयार करनी होंगी,
- digital learning resources बनाने होंगे,
- और schools को proper academic support देना होगा।
यदि केवल symbolic inclusion किया गया और practical implementation कमजोर रहा, तो अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाएंगे। इसलिए आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि CBSE और राज्य सरकारें इस फैसले को जमीन पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू कर पाती हैं।
क्या अन्य भाषाओं के लिए भी खुलेगा रास्ता?
मैथिली को CBSE में शामिल किए जाने के बाद अब अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लिए भी उम्मीदें बढ़ सकती हैं। भारत में सैकड़ों भाषाएं और बोलियां हैं, जिनमें कई धीरे-धीरे संकट का सामना कर रही हैं।
नई शिक्षा नीति regional languages को बढ़ावा देने की बात करती है। ऐसे में संभव है कि भविष्य में और भाषाओं को भी national-level school curriculum में जगह मिले।
यह भारत के linguistic diversity model को मजबूत कर सकता है।
![]()
अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
- CBSE में मैथिली कब से पढ़ाई जाएगी?
शैक्षणिक सत्र 2026-27 से CBSE पाठ्यक्रम में मैथिली को शामिल किया गया है।
- मैथिली को किस स्तर तक पढ़ाया जाएगा?
कक्षा 1 से माध्यमिक स्तर तक मैथिली को मातृभाषा विषय के रूप में पढ़ाया जा सकेगा।
- यह फैसला किस नीति के तहत लिया गया है?
यह निर्णय राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के प्रावधानों के तहत लिया गया है।
- क्या मैथिली संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है?
हां, मैथिली भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में से एक है।
- इस फैसले से क्या फायदा होगा?
इससे मातृभाषा आधारित शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा, बच्चों की learning क्षमता बेहतर हो सकती है और क्षेत्रीय संस्कृति को संरक्षण मिलेगा।
निष्कर्ष
CBSE पाठ्यक्रम में मैथिली को शामिल किया जाना केवल एक शैक्षणिक बदलाव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संकेत भी माना जा सकता है। यह फैसला दिखाता है कि भारत अब अपनी भाषाई विविधता को बोझ नहीं, बल्कि ताकत के रूप में देखने लगा है।
मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह व्यक्ति की पहचान, स्मृतियों और सांस्कृतिक जड़ों का हिस्सा होती है। यदि आने वाली पीढ़ियां अपनी भाषा से जुड़ी रहेंगी, तो वे अपनी संस्कृति से भी जुड़ी रहेंगी।
अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी implementation की है। यदि इस फैसले को सही तरीके से लागू किया गया, तो यह केवल मैथिली ही नहीं, बल्कि भारत की तमाम क्षेत्रीय भाषाओं के लिए एक नए युग की शुरुआत साबित हो सकता है।





